🔰गुजरात के कुछ वीर क्षत्रिय राजपुत यौद्धाओं के बारे मे लिखा है।

💪जिन्होने ना ही कभी किसी के सामने सर झुकाया है, ना ही कभी हार मानी है। अपनी प्रजा के रक्षार्थ अपनी और अपने परिवारो की गरदने कटवाई है, लेकिन कभी विदेशी आक्रमणकर्ताओ के आगे झुके नही…!!
🔰१ 🔰
जाम नरपतजी (जाडेजा) – जाम नरपतजी ने गजनी के पिरोजशाह बादशाह का सर उसी के दरबार मे काट डाला था | अदभुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए वे गजनी के सम्राट बने..
🔰२ 🔰
जाम अबडाजी “अडभंग” (जाडेजा) – 140 मुस्लिम लडकियो को बचाने के लिये दिल्ली के बादशाह अलाउदिन की विशाल सेना से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए..
🔰३ 🔰
जाम साहेबजी, पबाजी और रवाजी (जाडेजा) – सिंध के मिर्जा ईशा और मिर्जा सले को झारा के युद्ध (प्रथम) मे शर्मनाक हार दी..
🔰४ 🔰
जाम सताजी, कुंवर अजाजी और मेरामणजी हाला (जाडेजा) – कर्णावती(अहमदाबाद) के सुल्तान मुझफ्फर शाह को दिल्ली के बादशाह अकबर से बचाने के लिये ‘भूचरमोरी’ मे युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। जुनागढ के नवाब और लोमा काठी की दगाबाजी की वजह से जीता हुआ युद्ध हारे..
🔰५ 🔰
राव देशलजी जाडेजा – ईरानी आक्रमणकर्ता शेर बुलंदखान की सेना के आगे अपने बहुत कम योद्धाओ को लेकर देशलजी ने विधर्मीयो को अपने पैरो तले कुचल डाला… ईरानी सेना पागल कुत्तो की तरह भागने को मजबूर हो गयी..
🔰६ 🔰
लाखाजी जाडेजा (विंझाण) – सिंध के गुलामशाह कल्होरा से झारा के दुसरे युद्ध मे लडे… अदभुत शौर्य प्रदर्शित कर वीरोचित मृत्यु को प्राप्त हुए..
🔰७ 🔰
रायसंगजी झाला (हलवद) – अकबर के दरबार के पंजहथ्था पहलवान के साथ लडे. रायसंगजी की मुठ्ठी के एक ही प्रहार से पहलवान का सिर उसके धड मे घुस गया… अतुलनीय पराक्रम का उदाहरण..
🔰८ 🔰
रानजी गोहिल – कर्णावती(अहमदाबाद) के सुल्तान को युद्ध मे हराकर वापस लौट रहे थे, लेकिन उनकी रानीयो ने गलतफहमी की वजह से जौहर कर लिया…ये देख रानजी गोहिल वापिस सुलतान की सेना पर टूट पडे और वीरगति को प्राप्त हुए..
🔰९ 🔰
मोखडाजी गोहिल – दिल्ली के सुल्तान की सेना के साथ युद्ध। सिर कट जाने पर भी धड लडता रहा…अदभुत शौर्य का प्रदर्शन..
🔰१० 🔰
लाठी के वीर हमीरजी गोहिल – 16 साल की उम्र मे सोमनाथ मंदिर की रक्षा हेतु अपने कुछ मित्रो के साथ मिलकर मुजफ्फरशाह की सेना से भिड गये…उन्होंने कहा-‘भले कोई आवे ना आवे मारी साथे, पण हुन जैस सोमनाथ नी सखाते'(कोई मेरे साथ आए ना आए, लेकिन में सोमनाथ की रक्षा के लिये जाऊँगा) सोमनाथ महादेव को सिर अर्पण कर युद्ध किया…विधर्मीयो को काटते-काटते रणशैया पर सो गये..
🔰११ 🔰
लखधीरजी परमार (मुली) – हेजतखाँ की पुत्री को बचाने के लिये सिंध के पादशाह की सेना से लडे, लखधीरजी और उनके परिवार ने सिंध की सेना का बहादुरी से सामना किया और वीरगति को प्राप्त हुए..
🔰१२🔰
रा’नवघण (जुनागढ) – अपनी मुंहबोली बहन जाहल को बचाने के लिये सिंध पर आक्रमण किया। पादशाह को मारकर बहन जाहल को छुडाकर लाये..
🔰१३ 🔰
सोलंकी वंश में जन्मे वचरा दादा गुजरात के सबसे बड़े लोकदेवता हैँ। इन्होंने गायो की रक्षा के लिये विवाह के फेरो से उठकर आकर युद्ध किया और सर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा। आज गुजरात के घर घर में इनकी पूजा होती है।
🔰१४ 🔰
पाटन के सोलंकी वंश की रानी नैकिदेवी के सेनापति वीरधवल वाघेला और भीमदेव सोलंकी 2nd (पाटन) – भीमदेव और सेनापति वीरधवलजी ने मुहम्मद गौरी की सेना को आबु के पर्वतो मे कुचल डाला और कुतुबूदिन ऐबक की सेना को भी गुजरात के बाहर खदेड दिया..
🔰१५ 🔰
करनदेव वाघेला (पाटन) – अलाउदिन खिलजी की विशाल सेना के साथ लडे, हार गये लेकिन झुके नही, जंगलो मे जाके अपनी अंतिम सांस तक लडते रहे और वीरगति को प्राप्त हुए..
🔰१६ 🔰
वीरसिंह वाघेला (कलोल) – कलोल के वाघेला सरदार ने गुजरात के सुलतान मोहम्मद बेगडा का सामना किया, सुलतान वीरसिंह की रानी से शादी करना चाहता था, वीरसिंह बहादुरी से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए….रानी ने भी कुएं मे कुदकर अपनी जान देकर स्वाभीमान की रक्षा की..
🔰१७ 🔰
चंपानेर-पावागढ़ के खींची शाखा के चौहान– कर्णावती(अहमदाबाद) की सल्तनत की नाक के नीचे उससे संघर्ष करते हुए चंपानेर के खींची चौहानो ने 200 साल तक स्वतंत्र राज किया। अंत में रावल पतई जय सिंह जी ने महमूद बेगड़ा के साथ 20 महीनेे चले युद्ध के बाद पकड़े जाने पर उनकी वीरता से प्रभावित हो बेगड़ा द्वारा उन्हें इस्लाम स्वीकार और राज्य वापिस करने का प्रस्ताव देने पर उन्होंने मौत स्वीकार करी और उन्हें तड़पाकर मार डाला गया..
🔰१८ 🔰
इडर में राठौड़ो ने सैकड़ो साल तक अपने बगल में स्थित कही ज्यादा ताकतवर मुस्लिम सुल्तानों से लड़ते होने के बावजूद अपना अस्तित्व बनाए रखा और मस्जिदो को तोड़कर वापिस मन्दिर बनाते रहे। राव रणमल ने अपने से कई गुना ताकतवर सुल्तान मुजफ्फर शाह को बुरी तरह हराकर उसका घमण्ड तोडा।
🔰१९ 🔰
अमरसिंहजी डाभी(डांगरवा) – उनके और कड़ी के मुग़ल सरदार के बीच अपने राज्य में शिकार न करने की बातमे हुवे हमले में मुग़ल सरदार को हरा कर उसे वही मर दिया था और चुनौती दी थी कड़ी मुग़ल दरबार में के अगर कोई मुग़ल डांगरवा के इलाके में कदम भी रखेगा तो मार दिया जायेगा और उनके मृत्यु के कई साल तक किसी मुग़ल ने कड़ी से आगे आने का साहस नही किया थी.

उपरोक्त सभी महारथीओ ने अपने समय में अपना क्षत्रिय धर्म समझकर अपने समाज और लोगोकी रक्षा की है और अब हमें उनके दिए गए बलिदान का कर्ज चुकाना है .jay Mataji

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